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बुधवार, 13 सितंबर 2017

      प्राकृत और क्लासिकल संस्कृत काल (तारीखे अनुमानित है )

           750 ई पू ;वेदोतिर संस्कृति का कर्मिक उद्भव 
           500 ई पू   बोद्धो और जैनो के प्राकृत ग्रंथो का उद्भव (पूर्वी भारत)
            400 ई पू   पाणिनि दवरा वैदिक संस्कृति से पाणिनि कालीन संस्कृत में बदलाव का संकेत 
                             देने वाले संस्कृत व्याकरण का प्रणयन 
             322 ई पू  मोर्यो के बह्रमी लिपि के शिलालेख प्राकृत (पाली में )
              250 ई पू   क्लासिकल संस्कृत का जन्म ,100 -100 ई तक ई सन शिलालेखों में प्राकृत का स्थान 
                                  धीरे धीरे संस्कृत ने लिया 

         अपभृंश और पुरानी हिन्दी का उद्भव 

              400 ई  कालिदास के विक्रमा वर्शीय में उपभ्रश 
               500 ई वल्ल्भी के धारा सेना शिलालेख में अप्ब्रंश 

       साहित्य 

       779 ई उधोतन सूरी ने कुवलयमालाका  उल्लेख किया 
        769 सिद्ध सरहपाद दवरा दोहाकोश का प्रणयन उन्हें हिन्दी का पहला कवि माना जाता है 
        800 ई इसके बाद का ज्यादातर संस्कृत साहित्य टीकाओं के रूप में है 
        933 देवसेना की श्रवकाचार पहली हिन्दी पुस्तक 
         1100 ई आधुनिक देवनागरी लिपि का उद्भव 
      1145 -1229 हेमचन्द्र ने अप्ब्रंश व्याकरण लिखा 

   आधुनिक हिन्दी का उद्भव 

     1283 ई खुसरो की पहेलियाँ और मुकरियाँ हिंदुवी शब्द का इस्तेमाल 
     1398 --1518 ई कबीर की रचनाओं से निर्गुण भक्ति का जन्म 
     1370 असा हत के हंसावली दवरा प्रेमगाथाओ का काल 
     1400 -1479 राय घु अन्तिम अप्ब्रंश कवि 
     1450 सगुण भक्ति रामानंद से युग शुरुआत 
      1580  बूरहानुद्दीन जानम की प्रारम्भिक दखिनी कृति कालमितल हकयात 
     1585 नाभादास की भक्तिमाल हिन्दी भक्त कवियों का वर्णन 
      1601 ई बनारसीदास की पहली हिन्दी आत्मकथा  अर्ध कथानक 
      1604  गुरु अर्जुनदेव दवरा आदि ग्रन्थ में कई कविओ की रचनाओं का संकलन 
       1532 -1623 तुलसीदास की रामचरित मानस 
      1623 जटमल की गोरा बादल की कथा  खड़ी बोली की पहली पुस्तक 
     1643 रीतिकाल की काव्य परम्पराओ की शुरुआत --रामचंद्र शुक्ल 
     1645 साहजहा दवरा दिल्ली के किले का निर्माण आसपास की भाषा उर्दू कहलाई 
      1667 -1707  वली की रचनाये लोकप्रिय हुई दिल्ली की कुलीन घरानो में फ़ारसी को उर्दू ने हटाया  सौदा और मीर आदि ने अक्सर इसे उर्दू कहा 
      1600 -1825 बिहारी से लेकर पद्माकर तक कई कवियों को ओरछा और अन्य शासको का आश्रय 

        

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